Disha Bhoomi

Ghaziabad नाबालिग बेटी को डरा-धमकाकर लगातार एक साल तक दुष्कर्म करने वाले शराबी पिता को पाक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश हर्षवर्धन ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।
अदालत ने विधिक सेवा प्राधिकरण को आदेश दिया है कि पीड़िता को मानसिक और शारीरिक आघात की पूर्ति के लिए उचित प्रतिकर दिया जाए। प्रतिकर का भुगतान तीस दिन के अंदर जिलाधिकारी द्वारा प्रतिकार और पुनर्वास निधि से किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि अगर इस तरह की निधि नहीं है तो प्रतिकर का भुगतान राज्य सरकार द्वारा किया जाएगा। वहीं बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि ऑटो चालक पिता बेटी की असामाजिक हरकतों और इधर-उधर घूमने पर रोकता था तो उसने झूठा आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज करा दी थी।

2017 में दर्ज कराई थी रिपोर्ट
पाक्सो कोर्ट के विशेष लोक अभियोजक उत्कर्ष वत्स ने बताया कि विजय नगर थाने में 14 दिसंबर 2017 को पीड़िता ने अपनी मां के साथ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वह अपनी मां, भाई, मामा और पिता के साथ विजयनगर में किराए के मकान में रहती थी। मां एक स्कूल में नौकरी करती थी। वह सुबह 8:30 बजे काम पर चली जाती थी, जबकि मामा भी सुबह नौकरी पर और भाई स्कूल चला जाता था। पीड़िता बीकॉम की पढ़ाई करती थी। घर के सभी लोगों के चले जाने पर ऑटो चालक उसका पिता शराब पीकर दुष्कर्म करता था। किसी से बताने पर पीड़िता और उसकी मां की हत्या करने की धमकी देता था। इस डर से वह किसी को बताती नहीं थी। पीड़िता की मां ने अदालत में दर्ज कराए बयान में बताया था कि 14 दिसंबर को वह स्कूल से आई तो उसका पति और बेटी आपस में झगड़ रहे थे। बेटी रो रही थी और उसके पति ने शराब पी रखी थी। पूछने पर बेटी ने बताया कि एक साल से लगातार दुष्कर्म कर रहा है और अब वह पूरी तरह से टूट चुकी है।

नहीं मिला कोई साक्ष्य, पीड़िता के बयान पर मिली पिता को सजा
मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म के कोई साक्ष्य नहीं मिले थे, फिर भी अदालत ने नाबालिग के बयान को आधार बनाते हुए दोषी पिता को सजा सुनाई। बचाव पक्ष ने अदालत में इस बात को प्रमुखता से रखा कि किसी तरह का कोई साक्ष्य नहीं है। स्लाइड में शुक्राणु की पुष्टि नहीं हुई। किसी तरह का चोट का निशान नहीं मिला है। अदालत ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने विधि व्यवस्था में कहा है कि सिर्फ चिकित्सकीय साक्ष्य पर कोई निर्णय नहीं होगा। किसी स्वतंत्र साक्षी के परीक्षण कराने न कराने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। सिर्फ जबर्दस्ती का तथ्य एक मात्र पीड़िता के विश्वसनीय मौखिक साक्ष्य के आधार पर ही साबित किया जा सकता है।

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