महीना जुलाई का और साल 1968 था… इसी महीने एक सुबह सूरज सिर पे चढ़ता उससे पहले ही पाकिस्तान के अख़बारों में फ्रंट पेज पर छपी एक ख़बर पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई. दरअसल, जग्गा गुर्जर पुलिस मुठभेड़ में मारा गया था. पाकिस्तान के बाशिंदों के लिए ये नाम नया नहीं था, वो दशकों से इस नाम को सुन रहे थे. कुछ लोगों के ज़हन में ये नाम दहशत भर देता, तो कुछ लोग इस नाम की दुआएं पढ़ते. वहीं पुलिस की फाइलों में मोहम्मद शरीफ उर्फ जग्गा गुर्जर आतंक और भय का दूसरा नाम था. जग्गा इतना ख़तरनाक था कि उसके नाम पर जग्गा टैक्स वसूला जाता था. लेकिन एक फल वाले के सलाम से उसके अंत की कहानी शुरू हो गई.

भाई की हत्या और शरीफ बना जग्गा गुर्जर

जग्गा गुर्जर के अपराधी बनने की कहानी बिल्कुल किसी फिल्मी कहानी की तरह है. दरअसल, मोहम्मद शरीफ जब 14 वर्ष का था तब उसके भाई की हत्या कर दी गई और इसी हत्या का बदला लेने के लिए शरीफ बन गया पाकिस्तान का कुख्यात अपराधी जग्गा गुर्जर. सिलसिलेवार तरीके से अगर आपको पूरी कहानी बताएं तो वो कुछ ऐसी थी-

1954 में पाकिस्तान के लाहौर में एक मेला लगा था. हर तरफ चहल पहल थी. लोग मेले का आनंद उठा रहे थे. उस मेले में जग्गा का भाई माखन भी आया था. लेकिन माखन इस मेले में अकेला नहीं था… उन दिनों लाहौर का एक और बड़ा अपराधी हुआ करता था, अच्छा शोकरवाला. मेले में वो भी अपने साथियों के साथ आया था. दिन का कुछ वक्त ही बीता था कि अचानक मेले में अफरातफरी मच गई. शोर मचा कि अच्छा शोकरवाला के लोगों ने एक लड़के की हत्या कर दी. वो लड़का कोई और नहीं माखन गुर्जर था.

ख़बर जब 14 साल के जग्गा के पास पहुंची तो वो एक दम सुन्न पड़ गया…फिर उसने तय किया कि वह अपने भाई का बदला लेकर रहेगा. जग्गा ने 8 दिनों के भीतर अपने भाई की हत्या का बदला ले लिया और अच्छा शोकरवाला के उस आदमी को मौत के घाट उतार दिया जिसने उसके भाई की हत्या की थी. इस हत्या के बाद जग्गा जेल चला गया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. जग्गा ने जिस तरह से अपने भाई की हत्या का बदला लिया था, उसने लोगों के बीच उसे हीरो बना दिया था. उसके सपोर्ट में जेल के बाहर लड़के खड़े होने लगे थे और जेल के अंदर रहते हुए ही वह बड़ा नाम बन चुका था.

अच्छा शोकरवाला पर हमले

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, जग्गा जब जेल में था तो उसे पता चला कि उसके भाई की हत्या का असली मुजरिम तो अच्छा शोकरवाला है. क्योंकि इसी के कहने पर उस हत्यारे ने माखन की हत्या की थी. जग्गा ने जेल में रहते हुए ही अच्छा को मारने का प्लान बनाया और उस पर दो बार हमले करवाए. इस हमले में अच्छा शोकरवाला घायल हो गया और उसके दो आदमी भी मारे गए. इन हमलों ने जग्गा को जेल में बंद तमाम खुंखार कैदियों के बीच लोकप्रिय कर दिया और शहर में उसके नाम की तूती बोलने लगी.

जग्गा टैक्स की कहानी

जग्गा गुर्जर जब जेल से जमानत पर रिहा हुआ तो उसके स्वागत के लिए जेल के बाहर एक भीड़ खड़ी थी. जग्गा ये भीड़ देख कर समझ गया था कि वो अब एक आम पाकिस्तानी नागरिक नहीं रहा. उसने जेल से बाहर आते ही अपनी एक गैंग बना ली और लाहौर के बकरमंडी में कसाई समुदाय से जबरन टैक्स वसूलने लगा. जग्गा हर बकरे की ख़रीद पर हर कसाई से एक रुपये वसूल करता था. धीरे-धीरे इसी टैक्स को लोग जग्गा टैक्स के नाम से जानने लगे. जग्गा ने अपने समय पर ऐसे-ऐसे कांड किए कि उसे पाकिस्तान का बच्चा-बच्चा जानने लगा.

फल वाले का सलाम और जग्गा के अंत की कहानी

लाहौर के तत्कालीन एसएसपी हाजी हबीब-उर-रहमान, मुनीर अहमद मुनीर को एक इंटरव्यू देते हुए कहते हैं कि जग्गा के अंत की कहानी उसी दिन शुरू हो गई थी, जब उसका सामना लाहौर के डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान बांदियाल से एक फल की दुकान पर हुआ. दरअसल, डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान बांदियाल की हाल ही में लाहौर में पोस्टिंग हुई थी. यही वजह है कि वह जग्गा से वाकिफ नहीं थे. एक दिन डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान एक दुकान से फल खरीद रहे थे, तभी अचानक उस फल की दुकान पर एक जीप आकर रुकी.

जीप में से एक हट्टा कट्टा आदमी और उसके साथ 5, 6 हथियारबंद लोग उतरे. फल वाले ने उन लोगों को देखते ही, डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान का थैला छोड़ा और जग्गा को सलाम करने लगा. इसके बाद उसने जग्गा की जीप में कुछ फल की टोकरियां और शरबत की कुछ बोतलें रखीं. जग्गा बिना पैसे दिए अपनी जीप में बैठा और वहां से चला गया. डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान के लिए ये सब बिल्कुल चौंका देने वाला था. उन्होंने हैरत भरी आवाज़ में फल वाले से पूछा कि ये कौन था? फल वाले ने पहले उनकी तरफ हैरत से देखा और कहा कि आप लाहौर में नए लगते हैं. ये जग्गा बादशाह थे, लाहौर के असली बादशाह. पूरे लाहौर पर उनका राज चलता है.

जग्गा का एनकाउंटर

डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान ने उस दिन ठान लिया कि वो इस जग्गा को खत्म कर के रहेंगे. उन्होंने इसके लिए अपने ऊपर के अधिकारियों से बात की और जग्गा के पीछे लग गए. जग्गा को पता चल गया कि वह अब और पुलिस से नहीं बच सकता. जग्गा ने तुरंत डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान के पास एक पर्ची भेजी और उसमें लिखा कि वह पुलिस के लिए काम करने को तैयार है, इसके अलावा वो अपनी जान के बदले ढेर सारी रिश्वत भी देने को तैयार है. लेकिन डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान ने इसे ठुकरा दिया. जग्गा को जब पता चला कि अब उसकी दाल पुलिस के सामने नहीं गलेगी तो वह लाहौर से भाग कर पीओके चला गया.

लेकिन कुछ समय बाद ही उसे अपनी मां की याद आने लगी… फिर जुलाई 1968 में उसने फैसला किया कि वह अपनी मां से मिलने लाहौर जाएगा. उधर मुखबिरों ने जग्गा के लाहौर आने की सूचना डिप्टी कमिश्नर फ़तेह मोहम्मद ख़ान को दे दी. खान ने ठान लिया कि इस बार जग्गा बच के नहीं जा पाएगा और उन्होंने अपनी पूरी तैयारी उसके आने से पहले ही कर ली. उस दिन जग्गा जैसे ही अपने घर पहुंचा, खान ने पूरी फोर्स के साथ उसे घेर लिया.

जग्गा भी कहां मानने वाला था, जग्गा और उसके साथी ने पुलिस पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं. लेकिन इस बार पुलिस जग्गा पर भारी पड़ी और जग्गा के साथ-साथ उसका साथी भी इस मुठभेड़ में मारा गया. जग्गा के मरने की खबर जैसे ही लाहौर में फैली उसका शव देखने के लिए पूरा शहर उमड़ पड़ा. जग्गा को मारने वाली पुलिस टीम को सरकार ने पुरस्कार और मेडल दिए. बाद में 80 से 90 के दशक में पाकिस्तानी सिनेमा में इस कुख्यात अपराधी पर कई फिल्में बनीं.

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