Disha Bhoomi

मैं पुष्पेन्द्र रावत 1991 से भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता हूँ परन्तु पहले मैं एक किसान का बेटा हूँ।
कृषि क्षेत्र में लाये गए सुधारवादी कानून का किसान विरोध कर रहे हैं, इनमें दो मुख्य बिंदु हैं जिनपे ध्यान देना जरूरी हैं:-
1. MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) सरकार ने जब ये कानून बनाया तो इसमें MSP को कानूनी तौर पर निहित नही किया गया सरकार कहती तो है लेकिन इस पर कोई ठोस कानून में सजा का प्रावधान नहीं है इसके लिए अलग से धाराएं और सजा निश्चित होना चाहिए और ये भी निश्चित होना चाहिए कि सरकारी गैर सरकारी मंडी व्यापारी का समर्थन मूल्य से नीचे खरीदारी नहीं करेगा अन्यथा होगा क्या सरकारी मंडिया खरीद न करके अपना पल्ला झाड़ लेगी और किसान मजबूरी में निजी व्यापारी के पास अपनी फसल बेचने को मजबूर होगा। जिससे व्यापारी किसानों का खून चूसेगा इसके साथ-साथ एक अर्थव्यवस्था और खराब होगी किससे कालाबाजारी और बढ़ेगी किसानों से सस्ते कीमत पर फसल खरीद गया भंडारण करेगा और व्यापारी बैठे हुए कीमतों पर फसल बेचेगा आम आदमी को फसल महंगी मिलेगी और महंगाई भी बढ़ जाएगी साथ ही वस्तुएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएंगी व्यापारी सरकारी व गैर सरकारी मंडियां अगर फसल को एमएसपी पर खरीदेगी तो साथ-साथ पहुंचेगी जिससे कालाबाजारी और कीमतों बढ़ोतरी का डर खतम हो जायेगा। अभी तक मंडियो में फ़सल की खरीद पर लगभग 8.5%तक का टैक्स लगाया जा रहा है परंतु नई व्यवस्था में मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा इससे मंडियों से व्यापार बाहर जाने और भविष्य में मंडी बंद होने की आशंका बनी रहेगी इसलिए यह कानून होना चाहिए एमएसपी लागू होना चाहिए।।

2. देखने और सुनने में अच्छा लगता है कि फसल से पहले इसका मूल्य तय हो जाएगा और उसका पैसा खड़ा हो जाएगा लेकिन यह केवल देखने में अच्छा लग रहा है परंतु वास्तविकता कुछ और ही है जब किसान हमें बंद करेगा उस समय फसल तारीफ कुछ और जब फसल कटेगा डेट कुछ और होगी व्यापारी उसे बड़े हुए कीमत पर बेचेगा ऐसे में किसान को घाटा होगा उससे उसकी फसल का उचित कीमत नहीं मिल पाएगा अनुबंध कृषि-कृषि यानी संविदा खेती ऐसे में सरकार ने कांटेक्ट खेती की इजाजत दी है उसमें किसान की जमीन को व्यापारी व ठेकेदार एक निश्चित राशि पर अनुरोध कर लेगा और उस फसल को अपने हिसाब उसे बेचेगा दूसरी तरफ अपने फायदे के लिए किसी कर आएगा अगर व्यापारी शर्तों का उल्लंघन करता है तो किसान को सीधे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार नहीं है वह केवल उपखंड अधिकारी के यहां शिकायत दर्ज करा सकता है इसके अलावा इसी के अनुसार किसान व्यापारी के यहां बंद हुआ बनकर रह जाएगा उससे अपने ही जमीन पर नौकरों की तरह काम करना पड़ेगा यह व्यवस्था जमींदारी व्यवस्था भी कही जा सकती है इस तरह व्यापारी किसान की जमीन को अपनी शर्तों पर गिराता चला जाएगा और उस पर काबिज हो जाएगा ।।
3. स्वर्गीय चौधरी चरण सिंह जी ने अपने अथक प्रयासों से इस जमीदारी प्रथा को खत्म किया था और मजदूरों को मालिक बनाया था इसीलिए उनके जन्मदिन 23 दिसंबर को राष्ट्रीय शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है इसलिए 22 दिन से किसान धरने पर हैं मेरी सरकार से यह विनती है कि इस देश की रीड की हड्डी को हरसंभव मजबूती प्रदान करें।

Disha Bhoomi

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