Air Pollution: वायु प्रदूषण हर जगह अपने पैर पसार रहा है. बढ़ते वायु प्रदूषण से खांसी, गला खराब, सांस संबंधी बीमारियां, आंखों में जलन और शरीर में थकान महसूस होना जैसी समस्याएं रहती हैं. हाल ही में हुई एक स्टडी में चेतावनी दी गई है कि दुनिया में अब कोई ऐसी जगह नहीं बची, जहां की हवा साफ और शुद्ध हो. हवा लगातार जहरीली होती जा रही है. वैज्ञानिकों की मानें तो दुनिया की सिर्फ 0.0001 फीसदी आबादी ही कम प्रदूषित हवा में रह रही है. सालभर में से 70% दिनों में वायु प्रदूषित ही रहती है.
ये पहली ऐसी स्टडी है, जिसमें पूरी दुनिया के वायु प्रदूषण की गणना हुई है. मोनाश यूनिवर्सिटी ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक ने इस स्टडी को लीड किया. The Lancet जर्नल में हाल ही उनकी रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी.
मानकों से दोगुना है प्रदूषण
WHO के मुताबिक किसी भी इंसान के लिए रोज PM 2.5 का एक्सपोजर ज्यादा से ज्यादा 15 pg/m3 होना चाहिए. लेकिन साल 2000 से 2019 में इसका औसत दोगुने से भी ज्यादा था. 65 देशों में लगे 5446 मॉनिटरिंग स्टेशन से लिए गए डेटा के आधार पर यह स्टडी की गई, जिसमें पूर्वी एशिया सबसे ज्यादा प्रदूषित पाया गया. इसके बाद आता है दक्षिण एशिया का इलाका और आखिरी में है उत्तरी अफ्रीका.
सबसे कम प्रदूषण यहां
पिछले दो दशक में PM 2.5 का सबसे कम प्रदूषण न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में पाया गया. इसके बाद ओशिनिया और दक्षिणी अमेरिका में. जहां यूरोप और उत्तरी अमेरिका में साल 2000 से 2019 के बीच वायु प्रदूषण का स्तर घटा हैं, वहीं एशिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन में इसमें इजाफा हुआ है.
जलवायु परिवर्तन का असर
जलवायु परिवर्तन का भी वायु प्रदूषण पर असर पड़ता है. जहां उत्तर पश्चिम चीन और उत्तर भारत में पेट्रोल-डीजल के कारण सर्दियों में प्रदूषण बढ़ता है. वहीं उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट पर गर्मियों में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है. जिसका कारण होता है जंगली आग, जो वहां की वायु की गुणवत्ता को बहुत बिगाड़ देती है.
मोनाश यूनिवर्सिटी के एयर क्वालिटी रिसर्चर यूमिंग गुओ का कहना है कि इस स्टडी से यह पता चल पाया है कि बाहर कितना वायु प्रदूषण है. इसका इंसानों की सेहत पर क्या असर पड़ रहा है. इसकी मदद से सरकारें भी नियम-कायदे बना सकेंगी.
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