हाइलाइट्स
दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों की दीवारों पर कुछ तत्वों ने लिखे खालिस्तान समर्थक नारे
ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में भी ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने की हुई कोशिश
अलगाववादी नेता और ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह (Amritpal Singh) और उसके प्रमुख समर्थकों की गिरफ्तारी के बाद बेफिक्र हुई सरकार की चिंता राजधानी दिल्ली में खालिस्तान के कतिपय समर्थकों की ताजा गतिविधियों ने बढ़ा दी है.पश्चिमी दिल्ली के कुछ मेट्रो स्टेशनों की दीवारों पर खालिस्तान समर्थक नारों सरकार को अलर्ट मोड में ला दिया है. यह घटना दिल्ली में होने वाले G-20 शिखर सम्मेलन के कुछ दिन पहले सामने आई है. प्रतिबंधित खालिस्तान समर्थक संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के इस करतूत में शामिल होने का संदेह है.इन मेट्रो स्टेशन की दीवारों पर ‘खालिस्तान रेफरेंडम जिंदाबाद’ के नारे लिखे गए. उधर, एसएफजे नेता गुरुपतवंत सिंह पन्नू ने वीडियो जारी कर ऐलान किया है कि कनाडा के सरे में खालिस्तान समर्थक जनमत संग्रह होगा.इस वीडियो में पन्नू ने दावा किया कि दिल्ली के कई मेट्रो-स्टेशनों पर खालिस्तानी समर्थकों की ओर से स्लोगन लिखे गए हैं. घटना से इस बात की पुष्टि हुई कि कतिपय तत्व देश में खालिस्तान आंदोलन के नाम पर शांति व्यवस्था को खराब करने की कोशिश कर रहे हैं. हाल ही में ब्रिटेन,कनाडा और अमेरिका में भी खालिस्तान की मांग के समर्थन और भारत के विरोध में कुछ प्रदर्शन सामने आए हैं.
उधर, मेट्रो स्टेशन में खालिस्तान समर्थक नारे मामले में दिल्ली पुलिस ने केस दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी है. घटनास्थल के आसपास के CCTV फुटेज की जांच की गई है, जिसमें कुछ संदिग्ध लोग दिखे हैं. स्पेशल सेल इन संदिग्धों की पहचान कर इन्हें गिरफ्तार करने में जुटी है. इस घटना से पहले अमृतपाल और उसके समर्थकों ने इस वर्ष के प्रारंभ में पंजाब के अजनाला के थाने पर बंदूकों और तलवारों से हमला कर पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर खतरा पैदा कर दिया था. पुलिस इनके आगे बेबस नजर आई थी.
दीप संधू की मौत के बाद बना ‘वारिस पंजाब दे’ प्रमुख
लाल किला हिंसा मामले के आरोप दीप सिद्धू ने’वारिस पंजाब दे’ संगठन को स्थापित किया था.एक सड़क हादसे में दुर्घटना में दीप की मौत के बाद अमृतपाल ने इस संगठन की बागडोर अपने हाथ में ली थी.अमृतपाल वर्ष 2012 में दुबई गया था और वहां अपने पिता की ओर से संचालित संधू कार्गो कंपनी में काम करता था. दीप सिद्धू की अचानक मौत से जब ‘वारिस पंजाब दे’ प्रमुख का पद खाली हो गया था तो अमृतपाल ने खालिस्तानी समर्थकों के बीच अपने अलगाववादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए इसे आधार बनाया.
खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह को गिरफ्तार कर असम की डिब्रूगढ़ जेल में ले जाया गया था. (ANI Photo)
भिंडरावाले के पैतृक गांव में दस्तारबंदी समारोह
अमृतपाल वर्ष 2022 में दुबई से पंजाब लौटा था. उसने ‘वारिस पंजाब दे’ नाम की वेबसाइट बनाई और इसके जरिये खुद को संगठन के नए प्रमुख के तौर पर पेश किया.अमृतपाल ने अपने भाषणों में खालिस्तान की चर्चा शुरू की. सोशल मीडिया पर इसके वीडियो वायरल होने लगे. इसने मोगा जिले के रोड में एक ‘दस्तार बंदी’ समारोह आयोजित किया जो जरनैल सिंह भिंडरावाले का पैतृक गांव है. समारोह में शामिल भीड़ ने खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाए. इसी दौरान अमृतपाल ने खुद को वारिस पंजाब दे का प्रमुख घोषित कर दिया. खालिस्तान के समर्थन में बयानों और अन्य गतिविधियों से अमृतपाल जल्द ही पंजाब में सुरक्षा व्यवस्था के लिए खतरा बन गया. उसने सैकड़ों समर्थकों के साथ अजनाला के थाने पर बंदूकों-तलवारों से हमला किया जिसमें बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी जख्मी हुए थे.
केंद्रीय गृह मंत्री को चेतावनी दी थी
अमृतपाल की ताकत इतनी बढ़ गई थी कि उसने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चेतावनी दी कि वह सिखों को दबाने का प्रयास न करें अन्यथा इसके बुरे परिणाम होंगे. अमृतपाल के लिंक ISI के साथ जुड़े होने के प्रारंभिक संकेत मिलने के बाद केंद्र सरकार भी सतर्क हो गई थी. खालिस्तान समर्थक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए उसे विदेश से फंड मिलने का भी शक था. खुफिया एजेंसियों के अनुसार, अमृतपाल पंजाब को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की कोशिश कर रहा था. अमृतपाल पर जब शिकंजा कसने लगा तो मार्च 2023 में वह वेष बदलकर अपनी गाड़ी में भाग निकला था. एक माह से अधिक समय तक पुलिस के साथ ‘लुकाछुपी’ का खेल खेलने के बाद अमृतपाल ने नाटकीय घटनाक्रम के अंतर्गत 23 अप्रैल को सरेंडर कर दिया था. उसे गिरफ्तार कर लिया गया था और बाद में असम के डिब्रूगढ़ जेल शिफ्ट किया गया. भारत में अमृतपाल के इस गतिविधियों के बीच विदेशों से भी खालिस्तान मूवमेंट को बढ़ावा देने की घटनाएं सामने आई थीं.
लंदन में भारतीय उच्चायोग पर किया गया गया हमला
लंदन में भारतीय उच्चायोग पर मार्च 2023 में खालिस्तान समर्थक करीब 50 व्यक्तियों के समूह ने हमला किया था. इन्होंने भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का अनादर किया था और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था. इस घटना को लेकर भारत ने ब्रिटेन सरकार के समक्ष कड़ा विरोध दर्ज कराया था .
कनाडा में भारतीय राजनयिकों को धमकी वाले पोस्टर
कनाडा में इसी माह भारतीय राजनयिकों को धमकी देने वाले खालिस्तान समर्थक पोस्टरों सामने आए थे. भारत सरकार की ओर से विरोध दर्ज कराने के बाद राजनयिकों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. वैंकूवर में वाणिज्य दूतावास की इमारत के एंट्री गेट के पास भारत विरोधी पोस्टर लगाए गए थे जिन्हें बाद में हटाया गया था. खालिस्तानी समर्थक सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) की ओर से सोशल मीडिया पर 21 जुलाई को पोस्ट किए गए एक क्लिप में लोगों से कनाडा में भारत के राजनयिक मिशनों के ‘घेराव’ की भी अपील की गई थी. पिछले साल जुलाई के बाद से कनाडा में मंदिरों को अपवित्र करने की कम से कम छह घटनाएं हुई हैं. सबसे ताजा घटना के अंतर्गत सात जुलाई 2023 को ब्रैम्पटन में एक मंदिर के बाहर कनाडा में भारतीय राजनयिकों को निशाना बनाने वाला पोस्टर लगाया गया. अन्य घटनाओं में पेंट से खालिस्तान समर्थक नारे लिखे गए थे.
अमेरिका में भारतीय वाणिज्य दूतावास में आगजनी
अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को में जुलाई 2023 को भारतीय वाणिज्य दूतावास पर खालिस्तान समर्थकों ने हमला कर आगजनी का प्रयास किया था. एक स्थानीय चैनल ने बताया कि खालिस्तानी कट्टरपंथियों ने रात डेढ़ से ढाई बजे के बीच भारतीय वाणिज्य दूतावास में आग लगा दी थी हालांकि फायर डिपार्टमेंट ने इस पर तुरंत काबू पा लिया था. इससे पहले मार्च माह में भी खालिस्तानियों ने सेन फ्रांसिस्को में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हमला किया था.
कितनी पुरानी है खालिस्तान की मांग?
ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के बाद एक अलग सिख राष्ट्र की मांग शुरू हुई थी. बाद में प्रवासी सिखों के वित्तीय और राजनीतिक समर्थन तथा पाकिस्तान की ISI के समर्थन से ख़ालिस्तान आंदोलन को हवा देने की कोशिश की गई.1980 के दशक में उग्रवाद की शुरुआत हुई और पंजाब कई वर्षों तक हिंसा के साये में रहा. इस उग्रवाद को कुचलने के लिए भारत सरकार और सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार और ऑपरेशन वुड रोज़ चलाए. जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ऑपरेशन ब्लू स्टार का अंत हुआ था लेकिन उसकी बड़ी कीमत बाद में देश को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शहादत के रूप में चुकानी पड़ी थी.सिखों का एक बड़ा वर्ग खालिस्तान आंदोलन का समर्थक नहीं रहा है,इस कारण 1990 तक यह आंदोलन कमज़ोर पड़ गया था. बाद में विदेश में मौजूद खालिस्तान समर्थकों की ओर से इसे समय-समय पर हवा देने की कोशिश की जाती है.
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FIRST PUBLISHED : August 28, 2023, 18:37 IST
