<p>ओजोन परत जो हमारी पृथ्वी को सूर्य की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से बचाती है, उसमें साल 1980 के दशक की शुरुआत में वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका के ऊपर एक छेद दिखाई दिया. देखते ही देखते यह छेद बड़ा होने लगा और बाद में इसकी वजह से स्थिति इतनी भयावह हो गई कि अंटार्कटिका के आसपास की जलवायु में गंभीर परिवर्तन देखने को मिलने लगे. जब दुनिया भर के लोगों को इसके नुकसान का असर समझ आने लगा तो तमाम जिम्मेदार एजेंसियां और सरकारों ने मिलकर फैसला किया कि इस पर किसी भी तरह से कंट्रोल किया जाए. इसी के लिए मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया गया.</p>
<p><strong>क्या होता है मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल</strong></p>
<p>दरअसल, ओजोन परत में छेद जब बढ़ने लगा तब दुनिया भर के देशों ने मिलकर एक मॉन्ट्रियल सम्मेलन किया. इस सम्मेलन में नियम बनाए गए कि उन सभी पदार्थों के उत्पादन और उससे संबंधित उपकरणों पर प्रतिबंध लगाया जाएगा, जिसकी वजह से ओजोन परत में छेद हो रहा है. इसे साल 1989 में लागू कर दिया गया और इसी को मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल कहा गया.</p>
<p><strong>किस वजह से होता है ओजोन परत में छेद</strong></p>
<p>वैज्ञानिक मानते हैं कि जब साल 1980 में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में छेद दिखा, उसके बाद कहीं जाकर दुनिया भर के वैज्ञानिक इस पर रिसर्च करने में दिलचस्पी दिखाने लगे कि आखिर यह हो क्यों रहा है. रिसर्च में पता चला कि यह एक प्रकार के रसायन की वजह से हो रहा है, जिसे ओजोन डिप्लीडिंग सब्सटेंस यानी ओडीएस कहते हैं. इसमें जो प्रमुख होता है वह क्लोरोफ्लोरोकार्बन होता है, इसी की वजह से ओजोन परत में छेद होता है.</p>
<p><strong>ओजोन परत का छेद छोटा हो रहा है</strong></p>
<p>ओजोन परत को लेकर एक नई रिपोर्ट आई है जिसके मुताबिक, अब उसका छेद धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है यानी कि उसमें सुधार हो रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल का बहुत बड़ा योगदान है. क्योंकि इसकी वजह से प्रतिबंधित पदार्थों में से लगभग 99 फ़ीसदी का उपयोग पूरी तरह से बंद हो चुका है यानी उनका उत्सर्जन अब नहीं होता.</p>
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