गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा…, स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज में फिल्म शीरीं फरहाद (1956) का यह गीत, किसी जमाने में बीते दिनों को याद करने का एक कारगर औजार हुआ करता था. फिर वैश्वीकरण के दौर में पॉप की थिरकन के साथ पुरानी जींस और गिटार… जैसे गीतों ने मोहल्ले की छत और कॉलेज कैंटीन के दिन याद दिलाने में बरसों तक बाम का सा काम किया. आज सोशल मीडिया के दौर में वही काम थ्रोबैक के सहारे हो रहा है, जो सिने प्रेमियों को सिल्वर स्क्रीन की सौ-पचास साल की यात्रा पर ले जाते हैं, जिसे देखना, समझना और साझा करना एक ट्रेंड बनता जा रहा है.

दरअसल, यादें अनमोल होती हैं. सहेजकर रखी जाएं तो दस्तावेज और धरोहर बन जाती हैं. दिल से लगा ली जाएं तो दोस्त और दिलबर बन सकती हैं. अतीत, इतिहास, यादें, किस्सों-कहानियों और अफसानों की इस सिम-सिम को दर्शक और दिग्दर्शक, दोनों को टटोलते-खंगालते रहना चाहिए. एक अलग सी ताजगी मिलती है इससे.

हर साल दिसंबर के आखिरी पांच-दस दिनों में सालभर की महत्वपूर्ण घटनाओं का पुनरावलोकन, आकलन, विचार-मिमर्श, मंथन, एक रिवायत की तरह मीडिया में बरसों से चला आ रहा है, लेकिन सिनेमा से संबंधित थ्रोबैक थ्रेड्स, एक सिलसिलेवार ढंग से पुनरावलोकन की अवधि को कई गुना बढ़ा देते हैं, जिससे रोमांच की अनुभूति होती है. एक सामान्य दर्शक खुद को टाइम ट्रैवलर के रूप में पाता है, जब वह देखता है कि सौ साल पहले किसी भारतीय बैनर के लिए नल दमयंती, ध्रुव चरित्र, रत्नावली और सावित्री सत्यवान जैसी धार्मिक, भक्तिमय और पौराणिक फिल्में इटली और फ्रांस से आए निर्देशक बना रहे थे. और जरा सोचकर देखिये कि सौ साल पहले यानी 1922-23 के समय अंग्रेजों की हुकूमत के दौर में कितनी मुश्किल से फिल्में बन पाती होंगीं. तब फिल्म निर्माण से जुड़ी चीजों और अनुभव का भी घोर अभाव रहा होगा. हां, शायद कमी नहीं थी तो सिर्फ जज्बे और प्रयोगधर्मिता की.

यादों का रोमांच

पीरियड ड्रामा या कॉस्ट्यूम ड्रामा, के रूप में अतीत या उससे जुड़ी यादों को रोमांचक अंदाज में प्रस्तुत किया जाता रहा है. ताजा उदाहरण निर्माता-निर्देशक रोहित शेट्टी की इस साल क्रिसमस पर रिलीज होने वाली फिल्म सर्कस है, जिसमें 60 के दशक के दौर की यादों को लोटपोट कर देने वाले अंदाज में संजोया गया है. आइये देखते हैं कि रोहित शेट्टी 60 साल बाद, 60 के दशक की यादों का सफर किस रूप में करा रहे हैं.

जोर इस पर है कि अब से साठ साल पहले हमारी जिंदगी कैसी थी. समाज कैसा था, घर-परिवार, यारी-दोस्ती वगैरह-वगैरह सब कैसा हुआ करता था. जब मोबाइल नहीं था और टेलीविजन भी बहुत कम घरों में होता था, मनोरंजन की क्या अहमियत हुआ करती थी. खबरों की दुनिया कैसी थी. हम सब जानते हैं कि रोहित शेट्टी किस प्रकार से मनोरंजक फिल्में बनाते हैं. इस बार उनका फोकस अतीत के रोमांच का वर्तमान में अहसास कराने पर दिखाई दे रहा है, जिसके लिए उन्होंने सदियों से हंसी-ठिठोली के अचूक बाण माने जाने वाले विलियम शेक्सपियर के नाटक कॉमेडी ऑफ एरर्स, से अपना तरकश तैयार किया है.

दरअसल, कहने को छह दशक पहले की बात है, लेकिन तब और आज की चीजों में बहुत अंतर है. आज बेशक हमारे पास हर समय, हर जगह मनोरंजन पाने के बेशुमार साधन हैं, लेकिन आप हैरान हो सकते हैं कि टेलीविजन पर दैनिक प्रसारण की शुरुआत सन् 1965 में हुई थी. तब आबादी 43 करोड़ से अधिक थी, लेकिन देश में टेलीफोन की संख्या अनुमानित 10 लाख से भी कम रही होगी. सन् 1960 में भारत में एसटीडी सेवा शुरू हुई. इससे पहले ऑपरेटर की मदद से ट्रंक कॉल बुक कराकर दूर-दराज बात की जाती थी.

टेलीफोन की बात चली है तो तलत महसूद की आवाज में एस. डी. बर्मन द्वारा संगीतबद्ध, फिल्म सुजाता (1959) का एक गीत ‘जलते हैं जिसके लिए…’, याद आ रहा है, जिसे अभिनेता सुनील दत्त और अभिनेत्री नूतन पर फिल्माया गया है. करीब सवा चार मिनट के इस गीत में टेलीफोन पर नायक (सुनील दत्त ) अपने रूमानी अंदाज में दूसरी ओर रिसिवर थामे गमगीन नायिका (नूतन) को अपने दिल का हाल बयां कर रहा है. इससे और दस साल पीछे जाने पर फिल्म पतंगा (1949) का गीत ‘मेरे पिया गए रंगून वहां से किया है टेलीफोन…’ याद आता है, जिसके केंद्र में फोन है. देख सकते हैं उस दौर में किस तरह से फिल्मों के जरिये फोन के प्रति लोगों की दिलचस्पी रही होगी.

उत्कृष्टता के पैमानों पर बिमल रॉय निर्देशित सुजाता का अपना एक मुकाम है, जो सन् 1960 में कान फिल्म समारोह में पहुंची थी. इसी साल एक तरफ के. आसिफ निर्देशित ऐतिहासिक फिल्म मुगल-ए-आजम रिलीज हुई तो दूसरी ओर आजादी के बाद बदलते भारत और चुनौतियों का चित्रण करती फिल्म हम हिन्दुस्तानी भी आयी.

भारतीय सिनेमा अपने स्वर्ण युग (1940 से 1960) के अंतिम दौर में था. ऑफ बीट सिनेमा को बचाने एवं प्रोत्साहन के लिए तब फिल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन (एफएफसी) की स्थापना की गई, ताकि फिल्मकारों को वित्तीय सहायता दी जा सके. हालांकि इससे केवल एक दशक पहले यानी 1950 की बात करें तो भारतीय सिनेमा, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री के रूप में गिनी जाने लगी थी, जिसकी सालाना ग्रॉस इनकम 250 मिलियन डॉलर (सन् 1953 में) थी.

चलिये थ्रोबैक का दायरा सत्तर से सौ साल करके देखते हैं. शायद रोमांच का स्तर और बढ़ जाए. यानी अगर हम 1922-23 या उस पूरे दशक के हालात पर नजर डालें तो देख सकते हैं कि ब्रिटिश अधीन भारत में मूक फिल्मों का दौर कैसे करवटें ले रहा था. फिल्मों पर एंटरटेन्मेंट टैक्स, पहली बार सन् 1922 में (बंगाल) ही लगाया गया था, फिर सन् 1923 में बंबई में शुरू हुआ.

इस पूरे दशक में कई और चीजें काफी खास हुईं. जैसे कि सेंसर बोर्ड का गठन और कोहिनूर फिल्म कंपनी कृत एवं कांजीभाई राठौड़ निर्देशित भक्त विदुर पर बैन लगना, जिसे पहली विवादास्पद एवं बैन फिल्म कहा जाता है. लेखक रॉय अर्मस ने अपनी किताब थर्ड वर्ल्ड फिल्म मेकिंग एंड दि वेस्ट, में जिक्र किया है कि अब तक फिल्म निर्माण और सिनेमाघरों की संख्या लगभग दोगुनी होने लगी थी और हम इस क्षेत्र में ब्रिटेन को पीछे छोड़ रहे थे. और फिर दशक के अंत में जब वॉल स्ट्रीट धड़ाम हुआ तो हॉलीवुड के कई स्टूडियो भारत की नवोदित फिल्म इंडस्ट्री में सुनहरे भविष्य की संभावनाएं तलाशने आने लगे.

अतीत से नाता

आपने अक्सर बड़े बुजुर्गों को कहते सुना होगा कि जब कुछ भी ठीक न चल रहा हो, तो ज्यादा हाथ-पैर मारने से अच्छा है थोड़े समय के लिए शांत बैठ जाना चाहिए. संघर्षभरे उन पुराने दिनों को याद करना चाहिए जब चीजें धीरे-धीरे आकार ले रही थीं. खुद का नहीं तो अपने बड़ों का गौरवशाली इतिहास बहुत कुछ सिखा जाता है. 56वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार सहित कई अन्य देसी-विदेशी फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित, परेश मोकाशी निर्देशित मराठी फिल्म हरिश्चंद्राची फैक्टरी (2009) में दिखाया गया है कि किस तरह से दादा साहब फाल्के को पहली भारतीय फिल्म राजा हरिश्चंद्र (1913) के निर्माण में दुनियाभर की कठिनाइयों और दुश्वारियों का सामना करना पड़ा था.

परेश मोकाशी, का करियर रंगमंच से एक बैकस्टेज कलाकार के रूप में शुरू हुआ. फिर एक लेखक और निर्देशक के रूप में इस दुनिया में लंबा समय बिताने के बाद उन्होंने जब अपनी पहली फिल्म हरिश्चंद्राची फैक्टरी, बनानी शुरू की तो उनके सामने भी कई चुनौतियां आयीं. रंगमंच की तुलना में फिल्म निर्माण उनके लिए एकदम नया था. निर्माता ढूंढने और पैसों की जुगाड़ में ही तीन साल लग गये. बार-बार यह सुनने के बाद कि फिल्म मराठी के बजाए हिन्दी में बनाओ, बड़ा सितारा लो और गीत-संगीत भी डालो, मोकाशी ने खुद से फिल्म बनाने का फैसला किया और बताते हैं कि इसके लिए उन्हें अपना घर तक गिरवी रखना पड़ा.

तुलना न भी की जाए तो पहली नजर में ऐसा ही लगता है कि अपनी पहली फिल्म बनाने में फालके और मोकाशी के सामने एक जैसी दिक्कतें थीं. इंडीपेंडेंट फिल्मकारों की प्रस्तुतियों का भारतीय सिनेमा की समृद्धि में अतुलनीय योगदान है. स्टूडियो संस्कृति के आने से पहले और बाद में भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जब ऐसे फिल्मकारों ने हवा के रुख के उलट अपनी बातों को रखा है. ऐसे में जब कई वाजिब और गैर वाजिब कारणों से हिन्दी फिल्म उद्योग की आर्थिक स्थिति पहले जैसी नहीं है और अपनी सामग्री एवं प्रस्तुतितरण सहित अन्य कई बातों को लेकर अक्सर आलोचना होती है, फिल्म बिरादरी के होनहारों को भारतीय सिनेमा के इतिहास पर इत्मीनान से थ्रोबैक अंदाज में नजर डालनी चाहिए.

खासतौर से उन फिल्म परिवारों की संतानों को, जिनका अतीत गौरवशाली और सफलतम फिल्मों की सिल्वर-गोल्डन जुबली से भरा पड़ा है. यह समझते हुए सौ या सत्तर साल पहले न तो आज जैसी सहूलियतें थीं और न ही सफलता के पैमाने, उनके पुरखों नें कैसे अपने पांव जमाए होंगे. बिना किसी प्रशिक्षण और अनुभव के लगभग सभी ने जीरो से शुरुआत की थी. उस दौर में हमारा फिल्म उद्योग चलना-फिरना सीख ही रहा था, तो पहला विश्व युद्ध, स्पेनिश फ्लू, वैश्विक मंदी और थोड़े ही समय बाद दूसरा विश्व युद्ध हुआ, जिसका कई चीज़ों पर व्यापक प्रभाव पड़ा. पर हौले-हौले ही सही हमारे फिल्मकार आगे बढ़ते रहे.

पहली मूक फिल्म से पहली बोलती फिल्म, आलम आरा (1931) तक आने में बेशक 18 साल लग गए, लेकिन तब तक हम चर्चा में आने लगे थे. किसी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भारत की ओर से जाने वाली पहली फिल्म मराठी भाषा में बनी संत तुकाराम (1936) थी. यह पहली ऐसी फिल्म बनी जो पूरे एक साल तक एक ही सिनेमा हाल में लगातार चली. अचानक से चारों ओर बहुत तेजी से बदल रहा था. नाच-गाने वाली संगीतमय फिल्में बनने लगीं, पहली रंगीन फिल्म किसान कन्या (1937) बनी. यहां तक की फिल्म इंडस्ट्री की पृष्ठभूमि लिए पहली फिल्म तेलुगु में विश्व मोहिनी (1940) में बनी. और यहां से आने वाले दो दशकों तक भारतीय सिनेमा ने अपने सबसे अच्छे दौर जिसे इतिहासकार फिल्मों के स्वर्ण युग के नाम से पुकारते हैं, को दिल से जिया.

दरअसल, आज यहां अतीत की यादों को ताजा करने से तात्पर्य सिर्फ इतना है कि सौ वर्षों से अधिक का जो हमारा फिल्म इतिहास है, वो इतना समृद्ध, संघर्षभरा और रचनात्मकता से भरा पड़ा है कि हमें बुरे दौर से उबरने के लिए कहीं और देखने की जरूरत शायद नहीं है. हम देखते हैं कि कैसे हमारे कई साथी और वरिष्ठ पत्रकार बंधु समय-समय पर पुराने दौर की दिग्गज फिल्म हस्तियों और अनसुने किस्सों से रूबरू कराते रहते हैं. बीते दिनों इसी ब्लॉग सेक्शन में गीतकार शैलेन्द्र को उनकी 56वीं बरसी पर याद किया गया. सत्यजीत रे की कालजयी फिल्म पाथेर पांचाली को ब्रिटिश पत्रिका साइट एंड साउंड 2022 द्वारा ऑल टाइम ग्रेट फिल्मों की सूची में शामिल किये जाने पर रे और इस फिल्म से जुड़ी यादों को समेटा गया. भारतीय सिनेमा और अमिताभ बच्चन के संदर्भ के साथ फिल्मकार ऋषिकेश मुखर्जी को उनकी जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में याद किया गया. लेख की शुरुआत में थ्रोबैक से आशय यही है कि हमें केवल पीछे झांककर ही नहीं थोड़ा रुककर भी देखना चाहिए.

कुछ दिन पहले कोलकाता में अपने करीब तीस मिनट से अधिक के संबोधन में बच्चन साहब ने शुरुआती लगभग बाइस मिनट तक सिर्फ और सिर्फ भारतीय सिनेमा के 110 वर्षों के इतिहास को बेहद कसे हुए अंदाज में समेटा. उन्होंने सन् 1895 में पेरिस में पहली बार सार्वजनिक तौर पर दिखाई गई फिल्म का जिक्र भी किया और बताया कि कैसे हमारी फिल्म इंडस्ट्री इन सौ बरसों में विपरीत हालातों के बावजूद अपने विचार रखने में सफल रही है.

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